1 डाॅलर की कीमत 91 रुपया पार: क्यों रुपया होता जा रहा कमजोर

भारतीय मुद्रा बाजार में हाल के दिनों में एक बड़ी हलचल देखने को मिली है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 91 रुपये के स्तर को पार कर गया है। यह गिरावट न केवल निवेशकों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की ज़िंदगी पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। सवाल यह है कि आखिर रुपया कमजोर क्यों हो रहा है? और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

1 USD=INR

डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने का क्या मतलब है?

जब कहा जाता है कि 1 डॉलर की कीमत 91 रुपये हो गई है, तो इसका अर्थ है कि अब 1 अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए 91 भारतीय रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। पहले जहां यह आंकड़ा कम था, वहीं अब रुपये की क्रय शक्ति घटती जा रही है।

सरल शब्दों में, रुपया कमजोर और डॉलर मजबूत हो रहा है।

17 दिसम्बर 2025 को 1 डाॅलर की कीमत करीब 2:25 PM पर 91 रुपये की कीमत के बराबर हो गया।

डाॅलर ने रुपया के मुकाबले एक साल में लगभग 6 रुपये तक बढ़ और लगभग 6.8% की वृद्धि हासिल की।

या

रुपया के एक साल में लगभग 6 रुपये तक कमजोर हुआ और प्रतिशत में लगभग 6.8% की कमी हुई।

भारतीय रुपया कमजोर होने के मुख्य कारण

1. अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी

अमेरिकी केंद्रीय बैंक (Federal Reserve) जब ब्याज दरें बढ़ाता है, तो वैश्विक निवेशक डॉलर में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी समझते हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि:

  • विदेशी निवेश भारत जैसे उभरते बाजारों से निकलने लगता है
  • डॉलर की मांग बढ़ती है
  • रुपया दबाव में आ जाता है

2. विदेशी निवेशकों की बिकवाली (FII Outflow)

जब विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं। इससे:

  • डॉलर मजबूत होता है
  • रुपये की सप्लाई बढ़ती है
  • रुपया कमजोर पड़ता है

3. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो:

  • आयात बिल बढ़ जाता है
  • डॉलर की मांग बढ़ती है
  • रुपये पर दबाव आता है

4. व्यापार घाटा (Trade Deficit)

भारत का आयात, निर्यात से अधिक होने पर व्यापार घाटा बढ़ता है। ज्यादा आयात का मतलब है:

  • अधिक डॉलर की जरूरत
  • रुपये की कमजोरी

5. वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव

युद्ध, आर्थिक मंदी की आशंका और अंतरराष्ट्रीय तनाव के समय निवेशक सुरक्षित निवेश (Safe Haven) की ओर भागते हैं, जिसमें डॉलर सबसे ऊपर होता है। इससे:

  • डॉलर मजबूत
  • रुपया कमजोर

रुपये की कमजोरी का आम लोगों पर असर

🔹 महंगाई में बढ़ोतरी

  • पेट्रोल, डीजल और गैस महंगी हो सकती है
  • मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और आयातित सामान के दाम बढ़ते हैं

🔹 विदेशी पढ़ाई और यात्रा महंगी

  • विदेश में पढ़ने वाले छात्रों का खर्च बढ़ता है
  • इंटरनेशनल ट्रैवल पर ज्यादा खर्च आता है

🔹 शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव

  • रुपये की कमजोरी से बाजार में अस्थिरता आती है
  • हालांकि IT और एक्सपोर्ट कंपनियों को फायदा मिल सकता है

क्या रुपये की गिरावट हमेशा नुकसानदायक होती है?

नहीं, हर बार नहीं।
कुछ मामलों में रुपये की कमजोरी से:

  • निर्यात बढ़ता है
  • IT, फार्मा और टेक्सटाइल जैसी एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों को फायदा होता है
  • विदेशी कमाई करने वाली कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है

सरकार और RBI क्या कदम उठा सकते हैं?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार मिलकर:

  • फॉरेक्स रिज़र्व का उपयोग
  • ब्याज दर नीति में बदलाव
  • विदेशी निवेश को प्रोत्साहन

जैसे उपायों से रुपये को संभालने की कोशिश करते हैं।

निष्कर्ष

1 डॉलर का 91 रुपये के पार जाना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी संकेत जरूर है, लेकिन यह पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। वैश्विक परिस्थितियां, अमेरिकी नीतियां और घरेलू आर्थिक फैसले—तीनों मिलकर रुपये की दिशा तय करते हैं।

निवेशकों और आम नागरिकों के लिए जरूरी है कि वे मुद्रा बाजार की इन चालों को समझें और अपने वित्तीय फैसले सोच-समझकर लें।

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